बेमिसाल नायकों का वो यादगार सीन, जिसने उन्हें दर्शकों के ज़ेहन से निकलने नहीं दिया


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अभिनेता तो कई आयेंगे और चले जायेंगे, लेकिन कुछ हैं जो हमेशा-हमेशा के लिए ज़ेहन में बाकी रह जायेंगे…

कई फिल्में बनती हैं बिगड़ती हैं, आती हैं जाती हैं, हिट होती हैं फ्लॉप होती हैं, लेकिन उन्हीं हिट फ्लॉप और आने चले जाने के बीच कुछ ऐसी भी हैं, जो हमेशा-हमेशा के लिए दर्शकों के ज़ेहन में कहीं बैठ कर रह जाती हैं। बेशक कई बार पुरानी कहानियों को नया करके दिखाया जाता है, लेकिन उन्हीं नये पुराने के बीच परदे पर कुछ ऐसा भी आता है, जो नायक की ज़िंदगी में मील का पत्थर साबित हो जाता है। यहां हम उन्हीं दस नायकों की दस फिल्मों और उन दस दृश्यों के बारे में बात करेंगे, जिन्होंने उन्हें बेहतरीन एक्टर के तौर पर फिल्म इंडस्ट्री में मजबूती से खड़ा कर दिया! वे दस किरदार, जो उनके न होते क्या होता! वे दस किरदार जो सिर्फ उनके लिए ही गढ़े गये, जिन्होंने उसे परदे पर जिया था!”

क्रमश:- ऊपर: धर्मेंद्र, देव आनंद, अमिताभ बच्चन, गुरू दत्त, संजय दत्त। नीचे: राज कपूर, शाहरुख खान, राजेश खन्ना, दिलीप कुमार, संजीव कुमार

पानी की टंकी पर चढ़े नशे में धुत्त शोले फिल्म का वो दृश्य तो आपको याद ही होगा, जिसमें वीरू बसंती को शादी के लिए राजी करने के लिए आत्महत्या करने की धमकी देता है। बेशक वो दृश्य फिल्मी और असल दोनों तौर पर नकली था, लेकिन यह दृश्य धर्मेंद्र के चाहने वालों को हमेशा उनकी याद दिलाता है।

फिल्म शोले फिल्म इंडस्ट्री की शायद सबसे बड़ी हिट फिल्म रही है। आज भी जब टीवी पर आती है, तो लोग उसे देखने बैठ जाते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने इस फिल्म को बीस-बीस बार भी देखा है। यह फिल्म 1975 में आई थी, जिसमें धर्मेंद्र ने वीरू का किरदार निभाया था। यादगार तो पूरी फिल्म थी, लेकिन वीरू का पानी की टंकी वाला सीन सबसे ज्यादा हिट हुआ और धर्मेंद्र को उसी सीन के लिए हमेशा याद किया जाता है।

फिल्म शोले के एक सीन धर्मेंद्र

शोले फिल्म में हर कलाकार अपनी भूमिका में पूरी तरह डूबा और हर किरदार उस हर कलाकार की पहचान बन गया। वीरू की भूमिका को लेकर धर्मेंद्र पर भी यही बात लागू होती है। वीरू करूणा, साहस और उर्जा से भरपूर था। फिल्म में उन्हें बहुत अच्छे संवाद मिले और रोमांस भरा हास्य भी। धर्मेंद्र एक ऐसे एक्टर रहे हैं, जो हर किरदार में डूब कर एक्टिंग करते थे। फिर बात चाहे शांत चरित्र की हो, विचारशील चरित्र की हो या फिर हास्य चरित्र की हो।

जब हिन्दी सिनेम की सबसे बेहतरीन फिल्मों का नाम लिया जाता है, तो गाइड का नाम अपने आप ज़ेहन में कौंध जाता है। देव आनंद की अदाकारी को लेकर तो कभी कुछ कहा ही नहीं जा सकता, लेकिन जो अदाकारी उन्होंने गाइड में दर्शकों के सामने प्रस्तुत की उसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा। फिल्म शुरू से लेकर अंत तक दर्शक को बांधे रखती है और उन्हीं सबके साथ देव साहब की एक फिल्म और थी, जिसके एक सीन ने दर्शकों के ज़ेहन में उन्हें हमेशा बनाये रखा। फिल्म थी तेरे घर के सामने।

देव आनंद, फिल्म ‘तेरे घर के सामने’ के एक सीन में

तेरे घर के सामने फिल्म 1963 में आई थी, जिसमें देव आनंद ने राकेश कुमार नाम के नौजवान लड़के का किरदार निभाया था। राकेश सुलेखा (नीतन, जिनके साथ उनकी जोड़ी खूब जमती थी) से प्यार करता है। फिल्म उनके माता-पिता के झूठे घमंड का मज़ाक उड़ाती है, जो युवा प्रेमियों के रास्ते में बाधा हैं। राकेश प्रेमिका के लिए घर बनाना चाहता । फिल्म में प्रमुख कलाकारों पर केंद्रित शॉट्स कई मिनट लंबे हैं, जिनमें उनकी अभिनय प्रतिभा निखर कर सामने आती है। देव सहजता से उस समय का लाभ उठाते हैं।

फिल्म तेरे घर के सामने में राकेश (देव आनंद) चलते पुर्जे का प्रेम से लबरेज नौजवान लड़का है, जिसे सब प्यार करते हैं। फिल्म के जिस सीन के लिए देव साहब को याद किया जाता है, उस सीन में राकेश और सुलेखा इस पर विचार कर रहे हैं, कि माता पिता का मन कैसे बदलें, उनकी रटी-रटाइ आपत्ति कैसे दूर करें कि ‘ये शादी नहीं होगी’। राकेश को भरोसा है कि उनकी शादी होकर रहेगी, वह सुलेखा से कहता है, ‘प्यार को प्यार जीत लेगा और ये शादी होगी।’ कहा जाता है, कि इस डायलोग के बाद सिनेमा घर में तालियों की गडगड़ाहट गूंज गई थी। यही वो सीन था, जिसके लिए देव साहब को अक्सर याद किया जाता है और जिसने उन्हें बेमिसाल बना दिया।

अमिताभ बच्चन तो शायद किसी परिचय के मोहताज ही नहीं हैं। उन्होंने जिस फिल्म को लिया उसमें जी उठे। हर किरदार में फिट बैठ गये। फिर बात चाहे रोमांस की हो, एक्शन की हो या फिर कॉमेडी की हो। अमिताभ बच्चन निखर कर तो हर सीन हर रोल में आते हैं, लेकिन जिसके लिए उन्हें सबसे ज्यादा याद किया जाता है वो फिल्म थी अमर, अकबर एंथनी।

फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ में महानायक अमिताभ बच्चन

मनमोहन देसाई की फिल्म अमर अकबर एंथनी सन् 1977 में आई थी, जिसमें अमिताभ बच्चन ने एंथनी की भूमिका निभाई थी। कहा जाता है, कि एंथनी अमिताभ बच्चन की अपनी कल्पना की उपज है। जब कोई अभिनेता ऐसी भूमिका पा लेता है, जो उसकी अभिनय प्रतिभा को उभार दे तो कमाल हो जाता है। इस किरदार की सहजता आनंदित कर देती है और बच्चन साहब तो हैं ही दर्शकों के वजूद पर पूरी तरह छा जाने वाले।

फिल्म अमर अकबर एंथनी का सबसे यादगार दृश्य वो है, जब नशे में धुत्त एंथनी आइने के सामने खड़ा होकर अपने आप से बात करता है। इस सीन के लिए संवाद नहीं लिखे गए थे, बच्चन ने इसे खुद ही तैयार किया था। असल में जब ये सीन शूट हो रहा था, तो मनमोहन देसाई सेट पर नहीं थे और बाद में सीन शूट होने के बाद मनमोहन को ये सीन बहुत भाया और आगे चलकर नजाने कितने अभिनेताओं ने इस सीन को अपनी-अपनी फिल्मों में अलग-अलग तरह से डालने की कोशिश की।

गुरूदत्त तो याद ही होंगे, वैसे ये कोई पूछने वाली बात नहीं। जो हिन्दी सिनेमा को जानता है वो गुरू दत्त को भी जानता है। गुरू का अपना जीवन कई तरह के उतार-चढ़ाव से गुज़रता रहा। सबकुछ होते हुए भी वो हमेशा अपने आप में खाली रहे। उनके चेहरे की उदासी और मासूमियत उनके सीनेमा में साफ-साफ दिखाई देती है। उन्हीं फिल्मों में से एक फिल्म है ‘मिस्टर इंड मिसेज 55’।

गुरूदत्त

गुरूदत्त की फिल्म मिस्टर एंड मिसेज 55 सन् 1955 में आई थी, जिसे खुद गुरूदत्त ने ही बनाया था। इस फिल्म में उनके साथ बेहतरीन और खूबसूरत अदाकार मधुबाला थीं। खुद को निर्देशित करना खासा मुश्किल काम होता है, लेकिन हॉलिवुड से प्रभावित अपनी इस फिल्म में गुरूदत्त बेरोजगार, प्रशिक्षित, तीव्र बुद्धि वाले और हाज़िरजवाब कार्टूनिस्ट बने हैं। गुरूदत्त उदास, विषादपूर्ण भूमिकाओं में दर्शकों को बांध लेते थे। लेकिन इस फिल्म की कॉमेडी में वे सहज और स्वाभाविक हैं। उनके पात्र का नाम प्रीतम है। प्रीतम पूरी तरह से असल ज़िंदगी का पात्र है। यह परिष्कृत फिल्म एक कटु व्यंग्य है और दर्शाती है कि विडंहनापूर्ण हास्य भी सही हाथों में आकर कितना सफल हो जाता है।
इस फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है, जब प्रीतम चुपचाप कार्टून बना रहा है। जॉनी बेवकूफी भरे चुटकुलों से उसका ध्यान बांटने की कोशिश करता है। यदि इस सीन की गंभीरता को समझा जाये तो यह बेहद ही भावुक दृश्य है। जो दर्शकों को प्रीतम (गुरूदत्त) के और करीब ले आता है।

गुरूदत्त ने अपने सिनेमाई सफर में कई बेहतरीन फिल्में कीं, फिर बात चाहे प्यासा की हो या फिर साहब बीवी और गुलाम की। वे अपनी सभी फिल्मों में उभर कर सामने आये, लेकिन जो सबसे दुखद बात थी, वो ये की जब तक वे इस दुनिया में रहे दुनिया ने उनकी फिल्मों को उस तरह नहीं स्वीकारा, जिस तरह उनके जाने के बाद।

जादू की झप्पी वाली संजय दत्त की मुन्नाभाई एमबीबीएस उन महान फिल्मों में से एक है, जिसे हिन्दी सिनेमा में हमेशा याद किया जायेगा। यह एक ऐसी फिल्म है, जो दर्शकों को डॉन (भाई) से प्यार करना सीखा देती है। एक ऐसा डॉन जो न तो किसी को कोई तकलीफ पहुंचाता है न किसी को परेशान करता है। वो अपनी ही जिंदगी के अजबो-गरीब समीकरणों में उलझा हुआ है। एक ऐसा डॉन जो सिर्फ प्रेम की भाषा समझता है।

फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में संजय दत्त चाकू से अपने कान खुजाते हुए

राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस 2003 में आई थी। इस फिल्म में संजय दत्त ने मुन्ना की भूमिका निभाई थी। बड़बोला, घमंडी, लेकिन दिल से प्यारा और मासूम मुन्नाभाई एक ऐसा शख्स है, जो कभी नहीं सुधरता और जिससे कोई शरीफ आदमी अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता। अपने खास अंदाज में संजय इस सनकी और मनमौजी चरित्र को एक ऐसा व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, जो आज के छैल-छबीले नायक से जुड़े उपहास और घृणा भाव को उभारता है। इस फिल्म में संजय को सामाजिक तबके या वर्ग वगैरह की परवाह नहीं, उसके लिए सामने वाला या तो जादू की झप्पी के काबिल है या फिर मामू है।

फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है, जिसमें मुन्नाभाई सोलह-सत्रह साल के उस लड़को को असल जीवन का पाठ पढ़ता है, जो प्रेम में नाकाम होकर आत्महत्या की कोशिश करता है। मुन्ना जिस हल्केपन से दर्शकों को एक गंभी मैसिज देता है, वो देखते बनता है।

बात चाहे श्री 420 की हो, मेरा नाम जोकर की हो, संगम की हो या बरसात की हो, राज कपूर ने अपनी हर फिल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। राज कपूर जैसे अभिनेता शायद सदी में एक बार होते हैं। उनकी उन्हीं फिल्मों के बीच एक बहुत खास फिल्म है आवारा।

राज कपूर

आवारा 1951 में रिलीज़ हुई थी। जिसे खुद राज कपूर ने ही बनाया था। राज कपूर ने इस फिल्म में एक छोटे-मोटे बदमाश का किरदार निभाया था, जिसका नाम राज होता है। इस फिल्म में राज के साथ नरगिस हैं। नरगिस ने रीटा का किरदार निभाया है। रीटा राज से प्यार करती है। रीटा के अभिभावक जज रघुनाथ (पृथ्वी राज कपूर) असल में राज के पिता है, जिन्हें वह नहीं जानता है। इस फिल्म में राज कपूर ने बिगड़ैल, आवारा की भूमिका अविश्वसनीय कुशलता से निभाई है।

समाज से तिरस्कृत युवक के कड़वे गुस्से को राज कपूर जैसी दक्षता से बहुत कम अभिनेताओं ने अभिव्यक्त किया है। असली पिता-पुत्र परदे पर भी पिता-पुत्र की भूमिका में पहली बार इसी फिल्म में आये। फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है जब राज जज रघुनाथ की पेशकश को ठुकराते हुए कहता है, “आज तक मैं अपने को दुनिया का सबसे बुरा और सबसे कमीना आदमी समझता रहा, मगर मानना पड़ेगा कि तुम तो मेरे भी बाप निकले।” ये एक सीन पूरी फिल्म की कहानी एक पल में बयां कर देता है।

स्वदेश का मोहन भार्गव भी उन उम्दा अदाकारी में आता है, जिसे फिल्म में शुरू से लेकर अंत तक देखने का दिल करता है। मोहन आज के उन युवाओं के लिए उदाहरण है, जो विदेश में जाकर अपने देश को भूल जाते हैं। यह फिल्म युवाओं में खासा पसंद की गई थी, जिसने सपन्न युवाओं को अपने देश के लिए कुछ बेहतर करने के लिए उकसाया था।

फिल्म स्वदेश के एस सीन में शाहरुख खान

आशुतोष गोवारिकर की फिल्म स्वदेश 2004 में आई थी, जिसमें शाहरुख खान ने मोहन भार्गव की भूमिका निभाई थी। मंजे हुए अभिनेताओं की तरह शाहरुख खान को भी चुनौती की ज़रूरत होती है और जब उन्हें उनकी स्थापित छवि से अलग भूमिका मिलती है, तो उन्हें उसे निभाते हुए देखना भी अपने आप में एक अनुभव है।

मोहन की भूमिका में शाहरुख एक शांत और समझदार इंसान हैं, जो जीवन के गहरे अर्थ की तलाश में है। अपनी जड़ों को खोजने के लिए वह अमेरिका से भारत लौटता है। आंतरिक दुविधा से जूझ रहे व्यक्ति की गहनता और कोमलता को उन्होंने सजीव किया है। इस फिल्म में शाहरुख ने बुद्धिमत्तापूर्ण, तड़क-भड़क से दूर, एक यादगार भूमिका निभाई है। फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है, जब मोहन गांव के स्कूल में एक बूढ़े अध्यापक को बच्चों से बात करते हुए सुन साधारण लोगों के जीवन को भीतर तक महसूस करता है। इस सीन में शाहरुख ने सिर्फ चेहरे के एक्सप्रेशन से ही दिल के भाव उकेर कर रख दिये हैं। ये कला भी सबके पास नहीं होती, लेकिन शाहरुख को पास है। अभिनय की दुनिया का बादशाह उन्हें यूं ही नहीं कहा जाता।

राजेश खन्ना की हिट्स को गिनने बैठें, तो शायद बहुत कुछ नाम तो छूट ही जायें। जिन राजेश खन्ना ने खामोशी, कटी पतंग, सफर, अमर प्रेम, दाग और आराधना जैसी फिल्में दीं, उन्हें याद किये बिना तो बेहतरीन और उम्दा अदाकारी के साथ एक बड़ी नाइंसाफी होगी। राजेश खन्ना की तो सभी फिल्में अपने आप में अॉस्कर विनिंग थीं, लेकिन जिसके लिए उन्हें सबसे ज्यादा याद किया जाता है, वो फिल्म है आनंद।

फिल्म आनंद के एक गीत में निश्छल मुस्कान बिखेरते राजेश खन्ना

हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद सन् 1970 में आई थी। इस फिल्म में आनंद की भूमिका सुपरस्टार राजेश खन्ना ने निभाई थी। इस फिल्म में राजेश खन्ना ने ये साबित कर दिया था, कि रोमांटिक भूमिकाओं में आंख झपकाने और आधी मुस्कान के आलावा वे दूसरी भूमिकाएं भी उतनी ही दक्षता से कर सकते हैं।

फिल्म में आनंद कैंसर का मरीज़ है, जिसकी ज़िंदगी में कुछ गिने-चुने दिन बाकी रह गये हैं। लेकिन वो अंत तक आशावादी बना रहता है। राजेश खन्ना की उत्कृष्ट अदाकारी ने चरित्र को यथार्थ बना दिया। फिल्म को जिसने देखा अपनी आंखों से गिरने वाले आंसुओं को रोक नहीं सका। आनंद एक आदर्श बन गया और लोगों की ज़िंदगी में जश्न मनाने का सबक भी।
फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है, जब आनंद दुनिया छोड़ कर जा चुका होता है और अचानक से टेप चल पड़ता है। आनंद के सशक्त अभिनय का ये असर है, कि टेप में चल रही आवाज़ उनकी मौजूदगी का आभास करा देती और दर्शक एक पल को इस उम्मीद में खुश हो जाता है, कि आनंद शायद अभी भी जीवित है। इसे कहते हैं सशक्त अभिनय, जो अभिनेता के जाने के बाद भी उसे जीवित छोड़ जाये।

दिलीप कुमार की फिल्म अंदाज भी एक ऐसी फिल्म साबित हुई जिसका सिर्फ एक सीन दिलीप साहब की पहचान बन गया। ये फिल्म महबूब खान ने बनाई थी।

दिलीप कुमार

दिलीप कुमार अभिनित फिल्म अंदाज सन् 1949 में आई थी, जिसे महबूब खान ने बनाया था। प्रेम त्रिकोण पर बनी इस फिल्म की सफलता में दिलीप कुमार की गुमसुम, व्यथित और गहन सोच में डूबे प्रेमी का बहुत बड़ा हाथ था। दिलीप नीना (नरगिस) से प्रेम करता है, जो राजन (राज कपूर) से प्रेम करती है और शादी भी। दिलीप जानते थे, कि सिनेमा में आवाज को ऊंचा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी चुप्पी से उस चरित्र के साथ तादात्म्य स्थापित कर लिया।

इस फिल्म का सबसे यादगार सीन वो था, जिसमें घर की सीढ़ियों पर नीना से झगड़ता राज नीना के दिये फूल को उछाल देता है और दिलीप उसे पकड़ लेता है। फिल्म का सिर्फ ये एख सीन पूरी कथा और दिलीप के निश्छल प्रेमी मन का प्रतीक है।

अब बात करते हैं उस बेहतरीन अभिनेता की, जिन्होंने फिल्में तो उतनी ज्यादा नहीं कीं जितनी बाकियों ने कीं, लेकिन जितनी भी कीं सबमें जीवंत हो उठे। यहां बात हो रही है, संजीव कुमार के बारे में। संजीव कुमार भी अपने समय के उन उम्दा अभिनेताओं में से एक हैं, जिन्हें उनकी अदाकारी के लिए हमेशा याद किया जाता है। संजीव की बेहतरीन फिल्मों में से सबसे बेहतरीन फिल्म थी शतरंज का खिलाड़ी।

फिल्म शतरंज का खिलाड़ी के एक सीन में संजीव कुमार

सत्यजित राय की फिल्म शतरंज का खिलाड़ी सन् 1977 में आई थी। इस फिल्म में संजीव कुमार मुख्य भूमिका में थे और उन्होंने मिर्ज़ा की भुमिका निभाई थी। इस भूमिका के लिए संजीव कुमार का चयन परफेक्ट था। संजीव कुमार के बिना इस फिल्म में किसी और को सोचा भी नहीं जा सकता। फिल्म में संजीव ने इकदम नफ़ीस उर्दू बोली और चरित्र को एक गहन, परिष्कृत शोखी और प्रमाणिकता प्रदान की। मिर्ज़ा को दोस्त मीर (सईद जाफरी) के रूप में एर संगी मिल जाता है। दोनों का मानना है कि शतरंज खेलने से बढ़कर जीवन की कोई उपयोगिता नहीं है। इसी सोच के साथ वे सिर्फ शतरंज खेलते रह जाते हैं और अंग्रेज भारत को अपने कब्जे में लेते जाते हैं।

फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है, जिसमें मिर्ज़ा की असंतुष्ट बीवी (शबाना आज़मी) उन्हें अपने कमरे में बुलाती है। पर वे उससे हाथ छुड़ा कर शतरंज खेलने जाने की कोशिश करते हैं। इस सीन में संजीव ने अपने चेहरे के भावों से डायलोग बोले हैं।

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