click here दिल के मरीजों के लिए अफोर्डेबल स्टेंट्स ने जगाई नई उम्मीद


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stent3दिल की एंजियोप्लास्टी में इस्तेमाल किए जाने वाले मेटल के परंपरागत स्टेंट्स उतने ही अच्छे हैं, जितने कि दवाओं की कोटिंग वाले स्टेंट। यह बात नॉर्वे में 9,000 से ज्यादा मरीजों पर किए गए अध्ययन में सामने आई है। यह नतीजा इसलिए भी अहम है कि हाल में भारत ने स्टेंट्स को कीमत नियंत्रण व्यवस्था के दायरे में लाने का निर्णय किया है। इससे नए और परंपरागत स्टेंट्स के लिए अलग-अलग प्राइस पर बहस शुरू हो गई है और सरकार इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों से बातचीत कर रही है।

नॉर्वे में किए गए अध्ययन में दोनों तरह के स्टेंट्स से मरीजों पर लंबे समय में पड़ने वाले असर को ध्यान में रखा गया। इसके लिए छह वर्षों तक उन पर नजर रखी गई। स्टडी में पाया गया कि जिन मरीजों में केवल मेटल वाले स्टेंट्स का इस्तेमाल किया गया था, उनकी जीवनचर्या उन मरीजों से कुछ खास अलग नहीं थी, जिनके इलाज में दवाओं की कोटिंग वाले स्टेंट्स का उपयोग किया गया था।

छह वर्षों के बाद इस अध्ययन में पाया गया कि दवा की कोटिंग वाले स्टेंट्स से जुड़े लोगों में किसी भी कारण और नॉन-फेटल स्पॉन्टेनियस मायोकार्डियल इन्फार्क्शन से होने वाली मौत की दर 16.6 पर्सेंट रही, वहीं परंपरागत मेटल स्टेंट्स के इस्तेमाल वालों में यह दर 17.1 पर्सेंट थी। स्पॉन्टेनियस मायोकार्डियल इन्फार्क्शन में दिल के किसी हिस्से में ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाती है, जिससे वहां की मसल्स डैमेज हो जाती हैं। आम बोलचाल में इसे हार्ट अटैक कहा जाता है।

नॉर्वेजियन रिसर्च काउंसिल और दूसरे नॉन-प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशंस के पैसे से हुए इस अध्ययन में कहा गया, ‘परक्यूटेनियस कोरोनरी इंटरवेंशन (PCI) पीड़ित मरीजों के मामले में दवा की कोटिंग वाले स्टेंट्स और मेटल वाले परंपरागत स्टेंट्स के इस्तेमाल से इलाज में कोई बड़ा अंतर सामने नहीं आया।’ PCI को आम बोलचाल में एंजियोप्लास्टी कहा जाता है। एंजियोप्लास्टी में बेहद पतली और लचीली ट्यूब यानी कैथेटर के जरिए बहुत छोटे से स्टेंट को दिल की उस धमनी में पहुंचाया जाता है, जिसमें कोलेस्ट्रॉल सहित अन्य चीजों के जमने के कारण खून बहने में बाधा पहुंच रही हो।

स्टडी में यह भी पाया गया कि दवा की कोटिंग वाले स्टेंट के इस्तेमाल वाले मरीजों में स्टेंटिंग की शुरुआती प्रक्रिया के बाद दोबारा और चिकित्सकीय मदद की जरूरत कम रही। ऐसे मरीजों में छह साल बाद रीवैस्क्युलराइजेशन की जरूरत की दर 16.5 पर्सेंट रही, जबकि मेटल स्टेंट्स के मामले में आंकड़ा 19.8 पर्सेंट रहा।

कुछ एक्सपर्ट्स ने कहा कि इंडिया में प्राइसिंग अथॉरिटीज को इस नतीजे पर गौर करना चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि क्या इंडिया में परंपरागत मेटल स्टेंट्स के जरिए इलाज को बढ़ावा दिया जा सकता है। ऐसे स्टेंट्स की लागत अभी 8000-10000 रुपये है, जबकि ड्रग कोटिंग वाले स्टेंट्स की लागत 75,000-125000 रुपये है।

हालांकि देश में कार्डियोलॉजिस्ट्स की सबसे बड़ी एसोसिएशन कार्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट शांतनु गुहा ने कहा, ‘स्टडी ने दिखाया है कि मरीजों की जान बचाने में दोनों स्टेंट्स में कोई फर्क नहीं है, लेकिन ड्रग कोटिंग वाले स्टेंट्स के कुछ और फायदे भी हैं।’ उन्होंने कहा कि भारत में मरीज अपने खर्च पर इलाज कराते हैं, ऐसे में दोबारा इस प्रोसिजर की जरूरत न पड़ना अहम है।

stent3स्टेंट के रेट कम करने की कवायद शुरू

दिल की धमनियों में लगने वाले स्टेंट को ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के शेड्यूल-1 में शामिल करने के बाद सरकार ने इसकी कीमतों पर लगाम लगाने की कवायद शुरू कर दी है। नैशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने अब इसकी कीमतें तय करने के लिए जनवरी के पहले हफ्ते में स्टेंट बनाने वाली कंपनियों, स्टेंट इंपोर्टर्स, उद्योग संगठनों, एनजीओ, अस्पतालों और कार्डियोलॉजिस्ट्स की मीटिंग्स बुलाई है। इसमें हर तरह के स्टेंट्स की कीमतें तय करने के लिए विचार-विमर्श किया जाएगा। गौरतलब है कि स्टेंट्स को मनमाने दामों पर बेचे जाने के कारण इसकी कीमतें कम करने के लिए सरकार पर लगातार कई ओर से दबाव पड़ रहा था।

स्टेंट को पहले ड्रग की कैटिगरी में रखा गया था, लेकिन इसकी कीमतें सरकार ने कभी तय नहीं की। इसकी वजह स्टेंट बनाने और बेचने वाली लॉबी का दबाव बताया जाता है। 2013 के ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) में स्टेंट को ड्रग की कैटिगरी से ही बाहर कर दिया गया। इसके कारण एनपीपीए को इसकी कीमतें तय करने का अधिकार नहीं रहा। अब दबाव पड़ने पर सरकार ने इसे डीपीसीओ के शेड्यूल-1 में शामिल कर दिया है। माना जा रहा है कि एनपीपीए संबंधित पक्षों से बातचीत कर जल्द ही इसके रेट तय कर देगा।

stent2कार्डियक स्टेंट के दाम पर MNC और देसी कंपनियों में बढ़ी तकरार

कॉरपोरेट हॉस्पिटल चेंस हो सकता है कि दिल के रोगियों के इलाज में काम आने वाले स्टेंट की प्राइस ज्यादा मुनाफे के लिए बढ़ा देती हों। मल्टीनेशनल स्टेंटमेकर्स और इंपोर्टर्स के एक लॉबी ग्रुप ने दावा किया है कि भारतीय कंपनियां जो स्टेंट बनाती हैं, उनका दाम वे इंपोर्टेड स्टेंट जितना ही ज्यादा रखती हैं। यह दावा एमएनसी और देसी कंपनियों के बीच स्टेंट के प्राइस कंट्रोल पर बढ़ते मतभेदों के बीच किया गया है।

कार्डियक स्टेंट एक पतले तार जैसा होता है, जिसका इस्तेमाल आर्टरी को खोलने के लिए किया जाता है, जो दिल तक खून ले जाती हैं। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) विभिन्न कार्डियक स्टेंट्स के दाम को रेगुलेट करने के लिए एक फॉर्मूले पर काम कर रहा है। उसने सभी संबंधित पक्षों की राय मांगी है। संभावना है कि एनपीपीए फरवरी के मध्य तक ड्रग (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर 2013 के नियमों के अनुसार कीमतों की लिमिट तय कर देगा।

एबॉट, मेडट्रॉनिक और बोस्टन साइंटिफिक सहित मल्टीनेशनल मेडिकल डिवाइस मेकर्स के लॉबी ग्रुप मेडिकल टेक्नोलॉजी एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा कि भारतीय स्टेंट इंपोर्टेड स्टेंट से बहुत सस्ते नहीं हैं। इसके डायरेक्टर प्रबीर दास ने कहा, ‘डोमेस्टिक और इंपोर्टेड स्टेंट्स के दाम एक जैसे हैं क्योंकि इन डिवाइसेज को इस्तेमाल करने में डॉक्टरों को ट्रेनिंग देने सहित अन्य इनवेस्टमेंट में डोमेस्टिक और ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स की लागत एकसमान ही रहती है।’

ईटी ने कई डिस्ट्रीब्यूटर्स से बात की, जिन्होंने कहा कि ज्यादातर देसी ड्रग इल्यूटिंग स्टेंट्स (DES) का मैक्सिमम रिटेल प्राइस अभी कम से कम 1.30 लाख रुपये है। डिस्ट्रीब्यूटर्स और डोमेस्टिक इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि भारतीय कंपनियों ने नए डीईएस के एमआरपी 1.50 लाख रुपये से ज्यादा पर फिक्स कर दिए हैं और इसी रेंज में मेडट्रॉनिक और एबॉट इंडिया जैसी ग्लोबल स्टेंट कंपनियां स्टेंट बेच रही हैं।

हालांकि भारतीय कंपनियों की राय एमएनसी से अलग है और उनका दावा है कि नए लॉन्चेज के मामले में देश में तैयार किए गए ज्यादातर स्टेंट्स के दाम इंपोर्टेड स्टेंट्स से कम हैं।

डोमेस्टिक मेडिकल डिवाइस कंपनियों के लॉबी ग्रुप एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री के फोरम को-ऑर्डिनेटर राजीव नाथ ने कहा, ‘जब एमएनसी के प्रॉडक्ट का दाम उछलता है तो भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को कस्टमर्स को बनाए रखने के लिए उसी तरह के ऊंचे एमआरपी के साथ दूसरे ब्रांड बनाने पड़ते हैं। अगर वे ऐसा न करें तो उनका मार्केट शेयर प्रभावित हो सकता है।’ उन्होंने कहा, ‘लेकिन इससे कृत्रिम रूप से दाम चढ़ते हैं और सरकार को प्राइस पर हदबंदी की व्यवस्था के लिए कदम उठाने की जरूरत पड़ जाती है। हमारे एमआरपी एमएनसी ब्रांड्स से 20-30% कम हैं।’

source by : navbharattimes.indiatimes.com


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